षटतिला एकादशी/Shat tila Ekadashi January 2026: तिथि, व्रत नियम, पूजा विधि, मंत्र और पूरी कथा
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📆 षटतिला एकादशी – तिथि का विस्तार
एकादशी तिथि आरंभ:
13 जनवरी 2026 को दोपहर लगभग 03:17 बजे से शुरू होगी।
एकादशी तिथि समाप्त:
14 जनवरी 2026 को शाम लगभग 05:52 बजे तक रहेगी।
इसका अर्थ:
शास्त्रानुसार तिथि आरंभ से ही व्रत का प्रभाव शुरू होता है, इसलिए अगर आप व्रत करना चाहते हैं तो दोपहर 3:17 बजे के बाद पूजा-उपासना के लिए तैयार हो जाएँ।
इस दिन पूजा, उपवास और भक्ति का भाव वही दिन तक रहेगा जब तक एकादशी तिथि समाप्त नहीं हो जाती।
शुभ पूजा-और-उपासना समय (मुहूर्त)
सुबह का शुभ समय (पूजा-आरंभ) –
07:15 बजे से 09:21 बजे तक यह समय विशेष शुभ माना जाता है।
सुबह जल्दी उठकर स्नान-ध्यान-पूजा इसी शुभ समय में करना श्रेष्ठ माना जाता है।
व्रत की अवधि (पूरी अवधि)
| कार्य | समय |
|---|---|
| एकादशी तिथि आरंभ | 13 जनवरी 2026 दोपहर 03:17 बजे से |
| एकादशी तिथि समाप्त | 14 जनवरी 2026 शाम 05:52 बजे तक |
| पारण (व्रत खोलने का समय) | 15 जनवरी 2026 सुबह 07:15 से 09:21 तक |
एकादशी का व्रत दिनभर (14 जनवरी को सूर्योदय से सूर्यास्त के बाद तक) रखा जाता है।
14 जनवरी तक तिथि चलने पर आज के दिन उपवास रखकर पूजा करें।
व्रत खोलने (पारण) का शुभ समय 15 जनवरी सुबह है।
पूजा-दिन का क्रम (Suggested Daily Plan)
13 जनवरी – तैयारी (दशमी दिन)
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दिन में या शाम को सात्विक भोजन करें।
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घर को साफ-सुथरा रखें।
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भगवान विष्णु का संकल्प लें।
14 जनवरी – एकादशी दिन
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प्रातः जल्दी उठें।
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तिल मिला जल लेकर स्नान करें।
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घर में तुलसी-विष्णु चित्र स्थापित करें।
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सुबह के शुभ टाइम में पूजा-आराधना करें।
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फलों, दूध-धर्मार्थ भोजन के साथ व्रत (निर्जल या फलाहार) रखें।
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भजन-कीर्तन और श्रीमद्भागवत/एकादशी कथा का पाठ करें।
15 जनवरी – द्वादशी दिन
-
पारण का शुभ समय सुबह है।
-
थोडा जल ग्रहण करें, फिर पारण करें।
-
पारण के बाद फलाहार ग्रहण कर व्रत समाप्त करें।
क्यों यह तिथि महत्वपूर्ण है?
षटतिला एकादशी को भगवान विष्णु का अत्यंत शुभ दिन माना गया है।
इस दिन तिल के छह प्रकार के उपयोग — स्नान, तिल का दान, तिल से भोजन, तिल से हवन, तिल का तर्पण, और तिल का फलाहार — पुण्य प्रदान करते हैं।
एकादशी तिथि का उल्लंघन न करें — जैसे अनाज, तांदूळ, चावल आदि का दान वर्जित माना जाता है, क्योंकि यह विष्णु-उपासना के नियम हैं।
आसान शब्दों में सारांश
तिथि शुरू: 13 जनवरी 2026 – दोपहर 03:17 बजे से
पूजा-उपासना: 14 जनवरी 2026 – दिनभर
शुभ पूजा समय: सुबह 07:15 – 09:21 बजे
एकादशी समाप्त: 14 जनवरी 2026 – शाम 05:52 बजे
पारण: 15 जनवरी 2026 – सुबहें 07:15 – 09:21 बजे
श्रद्धा से व्रत करने, भगवान विष्णु की पूजा करने और सही समय पर पारण करने से पुण्य फल अधिक मिलता है।
षटतिला एकादशी – व्रत के नियम
(क्या करें और क्या न करें)
क्या करें (Do’s)
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दशमी की रात को हल्का और सात्विक भोजन करें।
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एकादशी के दिन प्रातः जल्दी उठें।
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स्नान के जल में थोड़ा तिल मिलाकर स्नान करें।
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स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
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भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें।
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घर के मंदिर में दीपक जलाएँ।
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तुलसी पत्र अर्पित करें।
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दिनभर “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करें।
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तिल का दान करें – ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को।
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भजन, कीर्तन और एकादशी कथा का पाठ करें।
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शाम को पुनः पूजा करें।
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द्वादशी की सुबह शुभ समय में पारण करें।
क्या न करें (Don’ts)
-
एकादशी के दिन अनाज न खाएँ –
जैसे: चावल, गेहूं, दाल, आटा, रोटी, चावल आदि। -
मांस, मदिरा, तामसिक भोजन से पूरी तरह दूर रहें।
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क्रोध, झूठ, निंदा और विवाद से बचें।
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बाल और नाखून न काटें।
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अधिक सोना या आलस्य न करें।
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व्रत के दिन अपवित्र कार्यों से दूर रहें।
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बिना पारण के व्रत न तोड़ें।
पूजा करने की सरल विधि
(घर पर आसानी से करने योग्य)
प्रातः काल
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ब्रह्ममुहूर्त में उठें।
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तिल मिले जल से स्नान करें।
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साफ कपड़े पहनें।
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मंदिर में भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण का चित्र रखें।
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दीपक जलाएँ।
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हाथ जोड़कर व्रत का संकल्प लें:
संकल्प मंत्र (सरल रूप में):
“हे भगवान विष्णु!
मैं श्रद्धा से षटतिला एकादशी का व्रत कर रहा/रही हूँ।
आप मेरी रक्षा करें और मेरे पापों का नाश करें।”
पूजा के मुख्य मंत्र
-
विष्णु मंत्र
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
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ध्यान मंत्र
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं।
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्॥
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तुलसी अर्पण मंत्र
नमस्ते तुलसी देवी, नमो नारायण प्रिये।
विष्णुभक्तिप्रदे देवि, सत्यवत्यै नमो नमः॥
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व्रत प्रार्थना
हे प्रभु!
जैसे आपने इस व्रत से भक्तों का उद्धार किया,
वैसे ही मुझ पर भी अपनी कृपा बनाए रखें।
संध्या काल
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पुनः दीपक जलाएँ।
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विष्णु मंत्र का जप करें।
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एकादशी कथा पढ़ें या सुनें।
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भगवान को फल अर्पित करें।
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मन में शांति और भक्ति रखें।
द्वादशी – पारण विधि
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प्रातः स्नान करें।
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भगवान को जल और फल अर्पित करें।
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तुलसी दल के साथ जल ग्रहण करें।
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फिर फल या हल्का भोजन करके व्रत पूर्ण करें।
-
यथाशक्ति दान करें।
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